भक्ति बिन हैं सब लोग - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (132)

भक्ति बिन हैं सब लोग - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (132)

भक्ति बिन हैं सब लोग निखट्टू।
आपस में लड़बे - भिड़बे कौं जैसें जंगली टट्टू॥ [1]
नित उनकी मति भ्रमत रहत हैं, तैसे लोल पलट्टू।
‘नागरिया’ जगमें वे उछरत, जिहि विधि नटके बट्टू॥ [2]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (132)

भक्ति के बिना मनुष्य का जीवन निष्फल है। ऐसे लोग आपस में निरन्तर लड़ते-झगड़ते रहते हैं, जैसे जंगली घोड़े एक-दूसरे से भिड़ते रहते हैं। [1]

उनकी बुद्धि सदा चंचल और भ्रमित रहती है, कभी किसी ओर तो कभी किसी ओर भटकती रहती है। श्री नागरीदास कहते हैं कि ऐसे लोग संसार में उसी प्रकार नाचते और उछलते फिरते हैं, जैसे किसी नट की कठपुतलियाँ उसके संकेत पर नाचती हैं। [2]