सब तजि कीजिये सतसंग।
भक्ति, ज्ञान, विराग दायक, जुगल प्रेम अभंग॥ [1]
संत मुनि सुन, संत हरि, गुरु संत पावन गंग।
संत सेवत रसिक दंपति, मिलें सहित उमंग॥ [2]
- श्री किशोरी अलि जी, मन शिक्षा (31)
अन्य सब कुछ त्यागकर केवल सत्संग करना चाहिए, क्योंकि यह सत्संग ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्रदान करने वाला तथा युगल सरकार के प्रति अखंड प्रेम को दिलाने वाला है। [1]
हे मन सुनो, संत-मुनि साक्षात् श्री हरि स्वरूप हैं, संतों एवं गुरु में भेद नहीं होता, समस्त संत परम पावन गंगा के समान निर्मल हैं। ऐसे रसिक संतों की सेवा करने से युगल-दंपति श्री राधा-कृष्ण बड़े हर्षोल्लास के साथ मिल जाते हैं। [2]
भक्ति, ज्ञान, विराग दायक, जुगल प्रेम अभंग॥ [1]
संत मुनि सुन, संत हरि, गुरु संत पावन गंग।
संत सेवत रसिक दंपति, मिलें सहित उमंग॥ [2]
- श्री किशोरी अलि जी, मन शिक्षा (31)
अन्य सब कुछ त्यागकर केवल सत्संग करना चाहिए, क्योंकि यह सत्संग ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्रदान करने वाला तथा युगल सरकार के प्रति अखंड प्रेम को दिलाने वाला है। [1]
हे मन सुनो, संत-मुनि साक्षात् श्री हरि स्वरूप हैं, संतों एवं गुरु में भेद नहीं होता, समस्त संत परम पावन गंगा के समान निर्मल हैं। ऐसे रसिक संतों की सेवा करने से युगल-दंपति श्री राधा-कृष्ण बड़े हर्षोल्लास के साथ मिल जाते हैं। [2]

