‘नारायण’ निज हिये में अपने - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (54)

‘नारायण’ निज हिये में अपने - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (54)

‘नारायण’ निज हिये में, अपने दोष विचार।
ता पीछे तू और के, औगुण भलें निहार॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (54)
 
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि हे जीव! सबसे पहले तू अपने हृदय के भीतर झाँककर स्वयं के दोषों और दुर्गुणों का विचार कर और उनका भली-भांति निवारण कर। उसके बाद यदि फुर्सत मिले, तो भले ही तू दूसरों के अवगुणों को देखता रहना। (अर्थात् जब जीव स्वयं के दोष सुधारने लगेगा, तो उसे दूसरों में बुराई देखने का न तो समय मिलेगा और न ही अधिकार बचेगा)