(राग दरबारी - ताल तिताला)
तुम नाम जपन क्यों छोड़ दिया?
क्रोध न छोड़ा, झूठ न छोड़ा, सत्य बचन क्यों छोड़ दिया? [1]
झूठे जगमें दिल ललचाकर, असल वतन क्यों छोड़ दिया?
कौड़ीको तो खूब सँभाला, लाल रतन क्यों छोड़ दिया? [2]
जिन सुमिरनसे अति सुख पावै, तिन सुमिरन क्यों छोड़ दिया?
'खालस' एक भगवान भरोसे, तन-मन-धन क्यों छोड़ दिया? [3]
- श्री खालस जी
हे जीव! तुमने भगवान के नाम का जप करना क्यों छोड़ दिया? तुमने अपने भीतर के क्रोध और असत्य बोलने की आदत को तो नहीं त्यागा, परंतु सत्य वचनों का मार्ग क्यों छोड़ दिया? [1]
इस नश्वर और झूठे संसार के प्रपंचों में अपने मन को ललचाकर तुमने अपने वास्तविक निज-धाम को क्यों भुला दिया? तुमने कौड़ी के समान तुच्छ सांसारिक वस्तुओं को तो बहुत संभाल कर रखा, किंतु भगवान के नाम रूपी अमूल्य लाल रत्न को क्यों त्याग दिया? [2]
जिस प्रभु-स्मरण से परम आनंद और सुख की प्राप्ति होती है, तुमने उस सुमिरन को क्यों छोड़ दिया? श्री खालस जी कहते हैं कि एकमात्र भगवान के भरोसे रहकर अपने तन, मन और धन को उनके चरणों में समर्पित क्यों नहीं कर दिया? [3]
तुम नाम जपन क्यों छोड़ दिया?
क्रोध न छोड़ा, झूठ न छोड़ा, सत्य बचन क्यों छोड़ दिया? [1]
झूठे जगमें दिल ललचाकर, असल वतन क्यों छोड़ दिया?
कौड़ीको तो खूब सँभाला, लाल रतन क्यों छोड़ दिया? [2]
जिन सुमिरनसे अति सुख पावै, तिन सुमिरन क्यों छोड़ दिया?
'खालस' एक भगवान भरोसे, तन-मन-धन क्यों छोड़ दिया? [3]
- श्री खालस जी
हे जीव! तुमने भगवान के नाम का जप करना क्यों छोड़ दिया? तुमने अपने भीतर के क्रोध और असत्य बोलने की आदत को तो नहीं त्यागा, परंतु सत्य वचनों का मार्ग क्यों छोड़ दिया? [1]
इस नश्वर और झूठे संसार के प्रपंचों में अपने मन को ललचाकर तुमने अपने वास्तविक निज-धाम को क्यों भुला दिया? तुमने कौड़ी के समान तुच्छ सांसारिक वस्तुओं को तो बहुत संभाल कर रखा, किंतु भगवान के नाम रूपी अमूल्य लाल रत्न को क्यों त्याग दिया? [2]
जिस प्रभु-स्मरण से परम आनंद और सुख की प्राप्ति होती है, तुमने उस सुमिरन को क्यों छोड़ दिया? श्री खालस जी कहते हैं कि एकमात्र भगवान के भरोसे रहकर अपने तन, मन और धन को उनके चरणों में समर्पित क्यों नहीं कर दिया? [3]

