मोपै कहा कियौ तैं प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (44)

मोपै कहा कियौ तैं प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (44)

(राग पूर्वी)
मोपै कहा कियौ तैं प्यारी॥
सव विधि भयौ आधीन तिहारे, सघन पुंज नव कुंज विहारी।
अति आतुर अनुराग रंग्यौ तव, छिनुन चैन इन नैनन जारी॥ [1]
मोहि महाभय कवहु-कवहु जिय, होत अहोये छ्यौ कहारी।
कहत औरसों लाज लगत है, रामराय नित हंसत निहारी॥ [2]

- श्री रामराय जी, आदिवाणी (44)

प्रियतम श्री कुंजबिहारी अपनी प्राणप्रिया श्री राधा से अत्यंत आकुल होकर कहते हैं कि हे प्यारीजू! तुमने मुझ पर ऐसा कौन सा सम्मोहन-बाण चला दिया है कि यह सघन निकुंजों में विहार करने वाला नवल श्याम सब प्रकार से तुम्हारे पूर्णतः अधीन हो गया है। [1]

मेरा चित्त तुम्हारे प्रेम में ऐसा रंग गया है कि मेरे नेत्रों को तुम्हारे बिना एक क्षण भी चैन नहीं पड़ता। कभी-कभी मेरे हृदय में यह महाभय उत्पन्न होता है कि यदि तुमने मुझे तनिक भी दूर कर दिया तो मेरा क्या होगा! किसी अन्य से यह बात कहते हुए मुझे संकोच होता है; श्री रामराय कहते हैं कि श्री कृष्ण की इस अनन्य निष्ठा भरी दासता को निहारकर हँसने लगती हैं। [2]