त्वं भज हिरण्यगर्भ त्वमपि हरं - श्रील रूप गोस्वामी, पद्यावली (125)

त्वं भज हिरण्यगर्भ त्वमपि हरं - श्रील रूप गोस्वामी, पद्यावली (125)

त्वं भज हिरण्यगर्भ त्वमपि हरं त्वं च तत्परं ब्रह्म।
विनिहितकृष्णानन्दाम् अहं तु वृन्दाटवीं वन्दे॥

- श्रील रूप गोस्वामी, पद्यावली (125)

चाहे तुम ब्रह्माजी का भजन करो, चाहे तुम भगवान् शंकर का भजन करो, अथवा चाहे तुम उस निराकार परब्रह्म का ही भजन करो। किन्तु मैं तो उस श्रीधाम वृन्दावन की ही वन्दना करता हूँ, जो श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम-रस से पूर्णरूपेण ओत-प्रोत है।