श्री वृन्दावन सघन कुँज फूले - श्री आसकरन जी

श्री वृन्दावन सघन कुँज फूले - श्री आसकरन जी

(राग केदारौ)
श्री वृन्दावन सघन कुँज फूले नवदल पुहुप-पुंज,
त्रिविध समीर सीरी मंद-मंद आवै। [1]
उसीर-महल मध्य रावटी रची बनाय,
बैठी संग प्यारी सों तो पीय-मन भावै॥ [2]
अद्भुत गुन-रूप-रासि राजत चहुँ ओर सुबास,
बेनु-विलास मध्य केदारो राग गावै। [3]
मन्मथ कोटि कला जे सहचरि सकल समाज।
प्रेम-प्रीति-दरसन ‘आसकरन’ पावै॥ [4]

- श्री आसकरन जी

श्री वृन्दावन के सघन निकुंजों में नवीन पत्ते और पुष्पों के समूह खिले हुए हैं, जहाँ शीतल, मंद और सुगंधित (त्रिविध) पवन सुखद रूप से बह रही है। [1]

खस (उसीर) से बने शीतल महल के मध्य एक सुंदर रावटी (मंडप) रचाई गई है, जिसमें अपनी प्रियाजी के साथ विराजमान होकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हो रहे हैं। [2]

चारों ओर दिव्य सुगंध व्याप्त है और अद्भुत रूप व गुणों की राशि श्री प्रिया जी विराजमान हैं; ऐसे रसमय वातावरण में श्यामसुंदर अपनी वंशी की तान पर राग केदारौ का मधुर गायन कर रहे हैं। [3]

करोड़ों कामदेवों को लज्जित कर देने वाली कलाओं से सम्पन्न समस्त सखियों के समाज के मध्य, श्री आसकरन जी श्री युगल सरकार के प्रेम, प्रीति और दिव्य दर्शन का परम सौभाग्य प्राप्त करते हैं। [4]