नैन बैन मन श्रवण सब - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (16)

नैन बैन मन श्रवण सब - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (16)

नैन बैन मन श्रवण सब, जाय रहत पिय पास।
तनक प्रान घट में रहै, फिरि आवन की आस॥

- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (16)

विरहाकुल गोपी के नेत्र, वाणी, मन एवं कान प्रियतम श्यामसुंदर के पास ही चले गए हैं। उनके शरीर-रूपी घट में केवल थोड़े-से प्राण ही इस आशा से शेष हैं कि प्रियतम पुनः लौटकर आएँगे।