(राग ईमन)
बैठे दोउ झूलत कुंज हिंडोरें।
फूले द्रुम, फूलह वन वेली, बरखत हैं घन घोरै॥ [1]
तैसेई कोकिला कूजति प्रमुदित पवन झकोरैं।
'कुंभनदास' गिरिधर बंसीवट जमुना देत हिलोंरैं॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (386)
श्री युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) कुंजों के भीतर रचे सुंदर हिंडोले में एक साथ विराजमान होकर झूल रहे हैं। वृक्ष-लताएँ पुष्पित होकर खिल उठी हैं तथा आकाश में घने बादल घोर गर्जना कर सुंदर वर्षा कर रहे हैं। [1]
कोयलें आनंदित होकर कुहुक रही हैं तथा पवन झकोरे ले रही है। श्री कुंभनदास जी कहते हैं कि बंसीवट के सुंदर तट पर श्री गिरिधरलाल विराजमान हैं और निकट ही बहती हुई श्री यमुना जी आनंदमयी हिलोरे ले रही हैं। [2]
बैठे दोउ झूलत कुंज हिंडोरें।
फूले द्रुम, फूलह वन वेली, बरखत हैं घन घोरै॥ [1]
तैसेई कोकिला कूजति प्रमुदित पवन झकोरैं।
'कुंभनदास' गिरिधर बंसीवट जमुना देत हिलोंरैं॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (386)
श्री युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) कुंजों के भीतर रचे सुंदर हिंडोले में एक साथ विराजमान होकर झूल रहे हैं। वृक्ष-लताएँ पुष्पित होकर खिल उठी हैं तथा आकाश में घने बादल घोर गर्जना कर सुंदर वर्षा कर रहे हैं। [1]
कोयलें आनंदित होकर कुहुक रही हैं तथा पवन झकोरे ले रही है। श्री कुंभनदास जी कहते हैं कि बंसीवट के सुंदर तट पर श्री गिरिधरलाल विराजमान हैं और निकट ही बहती हुई श्री यमुना जी आनंदमयी हिलोरे ले रही हैं। [2]

