(कवित्त)
रूप रस मांते महा प्रेम पुंज राते,
नाते करि हांते मनु जीते अवधूत हैं। [1]
भावना विचारै सुउचारै नामु राधा-कृष्ण,
काम क्रोध लोभ भूले बुधि के अकूत हैं॥ [2]
त्यागी अनुरागी बडभागी सु अनन्य-गति
छिन छिन मोद के विनोदनि सो नूत हैं। [3]
वृंदावनधाम अभिराम नाम सांचे रचे,
रज मैं परे हैं तेई बडे रजपूत हैं॥ [4]
- श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (26)
जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं। [1]
जो सर्वदा श्री राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं का भावपूर्ण चिंतन करते हैं, उनका पावन नाम-उच्चारण करते हैं, तथा काम, क्रोध, लोभ से परे होकर अपार बुद्धि-विवेक से संपन्न हैं। [2]
वे पूर्ण त्यागी, अनन्य अनुरागी, महाबड़भागी और केवल एक श्री प्रिया-प्रियतम के ही आश्रित हैं; उनका प्रत्येक क्षण नित-नवीन परम आनंदमय रस में व्यतीत होता है। [3]
जो मनोहर श्री वृन्दावन धाम और सच्चे नाम में लीन होकर वृन्दावन की पावन रज में निष्काम भाव से पड़े रहते हैं, वास्तव में वे ही सबसे बड़े 'रजपूत' (शूरवीर) हैं। [4]
रूप रस मांते महा प्रेम पुंज राते,
नाते करि हांते मनु जीते अवधूत हैं। [1]
भावना विचारै सुउचारै नामु राधा-कृष्ण,
काम क्रोध लोभ भूले बुधि के अकूत हैं॥ [2]
त्यागी अनुरागी बडभागी सु अनन्य-गति
छिन छिन मोद के विनोदनि सो नूत हैं। [3]
वृंदावनधाम अभिराम नाम सांचे रचे,
रज मैं परे हैं तेई बडे रजपूत हैं॥ [4]
- श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (26)
जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं। [1]
जो सर्वदा श्री राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं का भावपूर्ण चिंतन करते हैं, उनका पावन नाम-उच्चारण करते हैं, तथा काम, क्रोध, लोभ से परे होकर अपार बुद्धि-विवेक से संपन्न हैं। [2]
वे पूर्ण त्यागी, अनन्य अनुरागी, महाबड़भागी और केवल एक श्री प्रिया-प्रियतम के ही आश्रित हैं; उनका प्रत्येक क्षण नित-नवीन परम आनंदमय रस में व्यतीत होता है। [3]
जो मनोहर श्री वृन्दावन धाम और सच्चे नाम में लीन होकर वृन्दावन की पावन रज में निष्काम भाव से पड़े रहते हैं, वास्तव में वे ही सबसे बड़े 'रजपूत' (शूरवीर) हैं। [4]

