झूठ कुटुम संग्रहे तजे सत - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

झूठ कुटुम संग्रहे तजे सत - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

झूठ कुटुम संग्रहे, तजे सत स्याम सनेही।
परमारथ को पीठ दीठ, स्वारथ मों दीन्हीं॥

- श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

जीव मिथ्या सांसारिक संबंधों एवं वस्तुओं के संग्रह में निरंतर लगा रहता है, परंतु अपने एकमात्र सच्चे हितैषी श्री श्यामसुंदर के अकारण-निश्चल प्रेम का परित्याग किए रहता है। वह परमार्थ से विमुख होकर उसकी ओर पीठ कर लेता है तथा अपनी दृष्टि और समस्त पुरुषार्थ केवल नश्वर संसार में स्वार्थयुक्त लगाए रखता है।