ललिता ललित प्रबीन बीन लै - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (31)

ललिता ललित प्रबीन बीन लै - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (31)

(राग विभास)
ललिता ललित प्रबीन बीन लै, गावत मधुर सुर ठाढ़ी।
पौढ़े सेज स्याम श्रीस्यामा, सुनत तान कानन रुचि बाढ़ी॥ [1]
अरुझि रहे अंग-अंग रसीले, प्रेम की गाँठ परी अति गाढ़ी।
कौन परी ये बान अलबेली, उठत नहीं रवि कृन काढ़ी॥ [2]

- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (31)

परम प्रवीण सखी श्री ललिता जी वीणा लेकर अत्यंत मधुर स्वर में प्रात:कालीन राग गा रही हैं। पुष्प-सेज पर पोढ़े हुए श्री श्यामा-श्याम इस मधुर तान को सुनकर अत्यंत रस-आनंद पा रहे हैं। [1]

उनके रसीले अंग-प्रत्यंग आपस में ऐसे लिपटे हुए हैं मानो प्रेम की अत्यंत सुदृढ़ गाँठ पड़ गई हो। दोनों पर न जाने कैसी अलबेली प्रेम-बान चढ़ी हुई है कि सूर्य की किरणें निकलने पर भी वे उस प्रेममग्न अवस्था से उठने का नाम नहीं ले रहे। [2]