वारि वारि अली पीवत पानी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

वारि वारि अली पीवत पानी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

वारि वारि अली पीवत पानी॥ [1]
निरखि निरखि सहचरी मनफूलत, युगल रूप की खानी।
युवति वृंद चहुंओर विराजै, सबहिन के मुख छवि की खानी॥ [2]
एक डाल की सी सब तोरी, एक बैस है बारह बानी।
रामसखी निज कुंज विलोकत, फिरत हिये हरखानी॥ [3]

- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

सखियाँ श्री युगल पर बार-बार स्वयं को न्योछावर करती हुई उनके ऊपर से जल वारकर पी रही हैं (यह एक प्रेममयी मंगल-रस्म है, जिसमें प्रेमास्पद पर इस भाव से जल वारा जाता है कि उन पर किसी प्रकार की बाधा अथवा अमंगल न आए)। [1]

रूप की खान इस दिव्य युगल की छवि को बार-बार निहारकर सहचरियों का मन आनंद से फूल उठा है। सखियों का समूह चारों ओर सुशोभित है, और उन सभी के मुखमंडल सौंदर्य की खान के समान आभायुक्त हैं। [2] 

वे सभी सखियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो एक ही डाल से तोड़ी गई कलियाँ हों, उन सभी की आयु समान (किशोर) है और उनका स्वर्ण जैसा शुद्ध सोने के समान दमक रहा है। श्री रामसखी अपने निज कुंज की इस अनुपम शोभा को देखकर, हृदय में अत्यंत हर्षित होकर, विचरण कर रही हैं। [3]