टेरत राधा-नाम, टरे न मुख तें नेकहूँ।
टरयो सबै बिस्राम, टेढ़ी दृग-छबि कब लहूँ॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (36)
श्री राधा के वियोग में श्री कृष्ण 'राधा' नाम की निरंतर पुकार कर रहे हैं, एक क्षण को भी मुख से नहीं भुला रहे। समस्त विश्राम को त्याग कर अब तो केवल यही लालसा है कि कब प्रिया जी की उस बाँकी चितवन की रसमय झाँकी प्राप्त होगी।
टरयो सबै बिस्राम, टेढ़ी दृग-छबि कब लहूँ॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (36)
श्री राधा के वियोग में श्री कृष्ण 'राधा' नाम की निरंतर पुकार कर रहे हैं, एक क्षण को भी मुख से नहीं भुला रहे। समस्त विश्राम को त्याग कर अब तो केवल यही लालसा है कि कब प्रिया जी की उस बाँकी चितवन की रसमय झाँकी प्राप्त होगी।

