(राग ईमन)
जै राधा मन हरनी मोहन, पद सरोज मम शीस धरे।
सींच सुधा निज कृपा दासि के, कीन्हे सूखे धान हरे॥ [1]
प्यास दृगन रूप रस प्यारी, अमी अंग छवि सानि भरे।
‘ललितकिशोरी’ हिये प्रकाशे, अंजन जुत चख सानधरे॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)
श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है। [1]
मेरे नेत्रों को उनके रूप-रस की ही परम प्यास है, जिनके प्रत्येक अंग का सौंदर्य अमृत रस में सराबोर है।श्री ललितकिशोरी जी कहते हैं कि काजल से युक्त वे नुकीले कटाक्ष रूपी नयन मेरे हृदय में नित्य-दिव्य प्रकाश उत्पन्न करते रहते हैं। [2]
जै राधा मन हरनी मोहन, पद सरोज मम शीस धरे।
सींच सुधा निज कृपा दासि के, कीन्हे सूखे धान हरे॥ [1]
प्यास दृगन रूप रस प्यारी, अमी अंग छवि सानि भरे।
‘ललितकिशोरी’ हिये प्रकाशे, अंजन जुत चख सानधरे॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)
श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है। [1]
मेरे नेत्रों को उनके रूप-रस की ही परम प्यास है, जिनके प्रत्येक अंग का सौंदर्य अमृत रस में सराबोर है।श्री ललितकिशोरी जी कहते हैं कि काजल से युक्त वे नुकीले कटाक्ष रूपी नयन मेरे हृदय में नित्य-दिव्य प्रकाश उत्पन्न करते रहते हैं। [2]

