अहो कुँवरि तुब रूप यह, नाहिंन राखत धर्म।
तेरी सुधि विसरावही, हमरे छेदत मर्म॥
- श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (5)
हे किशोरी जी (श्रीराधा)! आपका यह अनुपम सौन्दर्य किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करता। आपकी स्मृति मुझे अपनी सुध-बुध भुला देती है और मेरे हृदय के मर्मस्थल को प्रेम-बाणों से निरन्तर बींधती रहती है।
तेरी सुधि विसरावही, हमरे छेदत मर्म॥
- श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (5)
हे किशोरी जी (श्रीराधा)! आपका यह अनुपम सौन्दर्य किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करता। आपकी स्मृति मुझे अपनी सुध-बुध भुला देती है और मेरे हृदय के मर्मस्थल को प्रेम-बाणों से निरन्तर बींधती रहती है।

