हिंडोरौ ब्रज के आँगन माँच्यौ - गोस्वामी श्री हरिराय जी

हिंडोरौ ब्रज के आँगन माँच्यौ - गोस्वामी श्री हरिराय जी

(राग गौरी)
हिंडोरौ ब्रज के आँगन माँच्यौ।
वृंदाबन की सघन कुंज में, संकर तांडव नाच्यौ॥ [1]
एक नाचत एक भाव दिखावत, एक गावत सुर साच्यौ।
'रसिक प्रीतम' की बानिक निरखत, महा मोद मन राच्यौ॥ [2]

- गोस्वामी श्री हरिराय जी

ब्रज के आँगन में अलौकिक हिंडोला रचा गया है। श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में इस अद्भूत उत्सव को देखकर स्वयं भगवान शंकर भी आनंदातिरेक में तांडव नृत्य करने लगे हैं। [1]

सखियाँ नाच रही हैं, भाव-भंगिमाएँ प्रदर्शित कर रही हैं और शुद्ध स्वर में मधुर गान कर रही हैं। गोस्वामी श्री हरिराय जी कहते हैं कि श्री श्यामा-श्याम की इस अति सुंदर छवि को निहारकर मेरा मन परम आनंद में मग्न हो गया है। [2]