(सवैया)
यह प्रेम कथा कहिये किहि सोँ, जो कहै तो कहा कोऊ मानत है।
सब ऊपरी धीर धरायो चहै, तन रोग नहीँ पहिचानत है॥ [1]
कहि ‘ठाकुर’ जाहि लगी कसिकै, सु तौ वै कसकैँ उर आनत है।
बिन आपने पाँव बिबाँई भये, कोऊ पीर पराई न जानत है॥ [2]
- श्री ठाकुर जी
हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता। [1]
श्री ठाकुर कहते हैं कि जिसे प्रेम की तीव्र कसक और टीस लगी होती है, वही इसे अपने हृदय में अनुभव कर सकता है। जब तक स्वयं के पैरों में बिवाईयाँ न फटी हों, तब तक दूसरे की पीड़ा का वास्तविक अनुभव नहीं हो सकता। [2]
यह प्रेम कथा कहिये किहि सोँ, जो कहै तो कहा कोऊ मानत है।
सब ऊपरी धीर धरायो चहै, तन रोग नहीँ पहिचानत है॥ [1]
कहि ‘ठाकुर’ जाहि लगी कसिकै, सु तौ वै कसकैँ उर आनत है।
बिन आपने पाँव बिबाँई भये, कोऊ पीर पराई न जानत है॥ [2]
- श्री ठाकुर जी
हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता। [1]
श्री ठाकुर कहते हैं कि जिसे प्रेम की तीव्र कसक और टीस लगी होती है, वही इसे अपने हृदय में अनुभव कर सकता है। जब तक स्वयं के पैरों में बिवाईयाँ न फटी हों, तब तक दूसरे की पीड़ा का वास्तविक अनुभव नहीं हो सकता। [2]

