तुमसे हम को एक है - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (75)

तुमसे हम को एक है - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (75)

तुमसे हम को एक है, हमसे तुमहिं अनेक।
हो प्रीतम सो कीजिये, रहै प्रेम की टेक॥

- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (75)

हे प्रभु! मेरे लिए तो आप ही एकमात्र शरण व सर्वस्व हैं, किंतु आपके लिए तो मेरे जैसे अनगिनत जीव व अनुरागी हैं। अतः हे प्राणप्रियतम! आप जैसा भी उचित समझें वैसा व्यवहार करें, बस ऐसी कृपा करें कि हमारे इस निष्काम प्रेम की प्रतिज्ञा का सदा निर्वाह होता रहे।