सरस-सुगन्ध-मन्द मलयानिल, विहरत कुंजन माँहि।
जो क्रीड़ा श्री वृन्दावन मै, तिहूँ लोक में नाँहि॥
- श्री सूरदास, सूर सागर (4891)
श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में रसमयी, सुगंधित और मंद-शीतल मलय पवन बहती है। श्री धाम वृंदावन में जो अलौकिक प्रेम-विहार-क्रीड़ा होती है, वैसी रस-लीला तीनों लोकों में कहीं भी नहीं है।
जो क्रीड़ा श्री वृन्दावन मै, तिहूँ लोक में नाँहि॥
- श्री सूरदास, सूर सागर (4891)
श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में रसमयी, सुगंधित और मंद-शीतल मलय पवन बहती है। श्री धाम वृंदावन में जो अलौकिक प्रेम-विहार-क्रीड़ा होती है, वैसी रस-लीला तीनों लोकों में कहीं भी नहीं है।

