(कवित्त)
कबधौं हृदै क्यारी में प्रेम बीज अंकुरैगौ,
कबधौं रस प्रेमिन की संगति कराओगी। [1]
कबधौं वा रूप माधुरीं कू निरखेगे नैन ये,
कबधौं बिबि प्रेम छबि छकनि छकाओगी॥ [2]
कबधों परिकर में हित किसोरी जु कृपा करि,
हा हा अपनाय कब सहचरी बनाओगी। [3]
टेर सुनौं प्यारी जू अबेर जिन कीजै अब,
कुंजनि की खवासी कब दासी पै कराऔगी॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
हे किशोरी जी! न जाने कब मेरे हृदय रूपी क्यारी में दिव्य भगवद्-प्रेम का बीज अंकुरित होगा, और कब आप मुझे रससिक्त रसिक प्रेमियों का संग प्रदान करेंगी? [1]
मेरे ये नेत्र न जाने कब आपकी उस अनुपम रूप-माधुरी का दर्शन करेंगे, और कब आप मुझे श्री प्रिया-प्रियतम दोनों की परस्पर प्रेममयी अद्भुत छवि के रस-पान से पूर्णतः सराबोर करेंगी? [2]
हे प्रेम स्वरूपिणी श्री किशोरी जी! आप कृपा करके मुझे अपने निज प्रेमी-परिकर में कब अपनाएंगी और मेरी इस दीनताभरी प्रार्थना को सुनकर मुझे अपनी प्यारी सहचरी कब बनाएंगी? [3]
हे प्यारी जू! अब मेरी इस आर्त पुकार को सुन लीजिए और अब और अधिक विलंब मत कीजिए; आप अपनी इस दासी से नित्य निकुंजों की सेवा-टहल कब कराएंगी? [4]
कबधौं हृदै क्यारी में प्रेम बीज अंकुरैगौ,
कबधौं रस प्रेमिन की संगति कराओगी। [1]
कबधौं वा रूप माधुरीं कू निरखेगे नैन ये,
कबधौं बिबि प्रेम छबि छकनि छकाओगी॥ [2]
कबधों परिकर में हित किसोरी जु कृपा करि,
हा हा अपनाय कब सहचरी बनाओगी। [3]
टेर सुनौं प्यारी जू अबेर जिन कीजै अब,
कुंजनि की खवासी कब दासी पै कराऔगी॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
हे किशोरी जी! न जाने कब मेरे हृदय रूपी क्यारी में दिव्य भगवद्-प्रेम का बीज अंकुरित होगा, और कब आप मुझे रससिक्त रसिक प्रेमियों का संग प्रदान करेंगी? [1]
मेरे ये नेत्र न जाने कब आपकी उस अनुपम रूप-माधुरी का दर्शन करेंगे, और कब आप मुझे श्री प्रिया-प्रियतम दोनों की परस्पर प्रेममयी अद्भुत छवि के रस-पान से पूर्णतः सराबोर करेंगी? [2]
हे प्रेम स्वरूपिणी श्री किशोरी जी! आप कृपा करके मुझे अपने निज प्रेमी-परिकर में कब अपनाएंगी और मेरी इस दीनताभरी प्रार्थना को सुनकर मुझे अपनी प्यारी सहचरी कब बनाएंगी? [3]
हे प्यारी जू! अब मेरी इस आर्त पुकार को सुन लीजिए और अब और अधिक विलंब मत कीजिए; आप अपनी इस दासी से नित्य निकुंजों की सेवा-टहल कब कराएंगी? [4]

