सब ठाकुर को ठाकुर हरि - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सवैया (01)

सब ठाकुर को ठाकुर हरि - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सवैया (01)

(सवैया)
सब ठाकुर को ठाकुर हरि, ता ठाकुर को ठाकुर ठकुराँइनि।
माँनु दाँनु दे प्रांन प्रिया पति, रति जाचतु परताप दुरांइनि॥ [1]
निजु रस रीति प्रतीति प्रगट करि, धन्य जनम मांनत परि पांइनि।
कर कंकन दर्पन देखो न, श्रीबिहारिनिदास लहै मन भांइनि॥ [2]

- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सवैया (01)

यह बार सर्वस्व विदित है कि श्रीहरि समस्त ठाकुरों के भी ठाकुर हैं,  किन्तु उन सर्वेश्वर श्रीहरि की भी स्वामिनी श्रीराधा हैं। प्राणप्रिय श्रीकृष्ण अपना सारा मान-अभिमान त्यागकर अपनी स्वामिनी श्री राधा से प्रेम की याचना करते रहते हैं और अपना समस्त प्रभुत्व छिपाकर उनके प्रेम के अधीन होकर ही रहते हैं। [1]

इस प्रकार श्रीराधा अपने प्रेम-रस की अनोखी रीति और उसके प्रभाव को प्रत्यक्ष प्रकट करती हैं। उस आलोकिक रस को पान कर श्रीकृष्ण उनके चरणों में पड़कर स्वयं को धन्याती-धन्य मानते हैं। श्रीबिहारिनिदास कहते हैं कि जैसे हाथ के कंगन को देखने के लिए दर्पण की आवश्यकता नहीं होती; उसी प्रकार इस अद्भुत-रस का सहज भाव भाव से पान करने वाले अनन्य रसिक सदा तन-मन से प्रफुल्लित रहते हैं। [2]