(राग भैरवी त्रिताल)
बसौ नित नैनन मांही लली।
वृन्दाविपिन निकुञ्ज भवन में, जहाँ ललितादि अली॥ [1]
चित वित चितै पिय तन श्यामा, मुस्काय नेक चली।
श्रोगोपालहित हरिस्वामिनि, जेसे कुन्द कली॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (16)
हे लाड़िली श्री राधा जू! आप ललिता आदि सखियों के संग श्री वृन्दावन धाम के निकुंज-भवन में निवास करते हुए सदा मेरे नयनों में बसी रहें। [1]
जहाँ आप अपने प्रियतम श्री श्यामसुंदर की ओर निहारती एवं मुस्कुराती हुई, सहज भाव से विचरण करती हैं। श्री हित गोपाल दास कहते हैं कि मेरी स्वामी श्री राधा कुंद की कली के समान अत्यंत सुकोमल, उज्ज्वल और सुंदर हैं। [2]
बसौ नित नैनन मांही लली।
वृन्दाविपिन निकुञ्ज भवन में, जहाँ ललितादि अली॥ [1]
चित वित चितै पिय तन श्यामा, मुस्काय नेक चली।
श्रोगोपालहित हरिस्वामिनि, जेसे कुन्द कली॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (16)
हे लाड़िली श्री राधा जू! आप ललिता आदि सखियों के संग श्री वृन्दावन धाम के निकुंज-भवन में निवास करते हुए सदा मेरे नयनों में बसी रहें। [1]
जहाँ आप अपने प्रियतम श्री श्यामसुंदर की ओर निहारती एवं मुस्कुराती हुई, सहज भाव से विचरण करती हैं। श्री हित गोपाल दास कहते हैं कि मेरी स्वामी श्री राधा कुंद की कली के समान अत्यंत सुकोमल, उज्ज्वल और सुंदर हैं। [2]

![बसौ नित नैनन मांही लली - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (16)](https://images.brajrasik.org/6a7c0db7ffef9000043a5a5e-m.jpeg)