(कवित्त)
कौन दिन ऊँचे सुर राधिका लतान कहूँ,
गहूं वनराज गति मति पंगु होयगी। [1]
कौन दिन स्वामिनी की सहचरी कहाऊँ गाऊँ,
जुगल सनेह गीत मति अति मोयगी॥ [2]
कौंन दिन वीथिन में टक टक हेर रहौं,
लोचन सिराये छबि सुध बुध खोयगी। [3]
कौंन दिन प्यारी जू के चरन पलोटौं बीर,
प्रेमसखी नाम जाकों पद पद्म पोगी॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (57)
वह दिन कब आएगा जब मैं श्री वृन्दावन की लताओं के मध्य ऊँचे स्वर में 'श्री राधिका! श्री राधिका!' पुकारूँगी और श्री वृंदावन धाम के उस परम-रस में मेरी गति और बुद्धि पंगु (स्तब्ध) हो जाएगी? [1]
वह दिन कब आएगा जब मैं अपनी स्वामिनी जू की सहचरी कहलाऊँगी और श्री युगल के अनन्य प्रेम के गीत गाते हुए मेरी बुद्धि पूरी तरह प्रेम में मग्न हो जाएगी? [2]
वह दिन कब आएगा जब मैं श्री धाम वृन्दावन की कुंज-गलियों में टकटकी लगाकर श्री श्यामा-श्याम की बाट जोहूँगी और उनकी अलौकिक छवि का पान कर अपने नेत्रों को शीतल करते हुए अपनी देह की सुध-बुध खो बैठूँगी? [3]
हे सखी! वह दिन कब आएगा जब मैं अपनी प्यारी जू के सुकोमल चरणों को अपने हाथों से दबाऊँगी क्योंकि प्रेमसखी की एकमात्र अभिलाषा उन्हीं के चरणकमलों की निष्काम सेवा है। [4]
कौन दिन ऊँचे सुर राधिका लतान कहूँ,
गहूं वनराज गति मति पंगु होयगी। [1]
कौन दिन स्वामिनी की सहचरी कहाऊँ गाऊँ,
जुगल सनेह गीत मति अति मोयगी॥ [2]
कौंन दिन वीथिन में टक टक हेर रहौं,
लोचन सिराये छबि सुध बुध खोयगी। [3]
कौंन दिन प्यारी जू के चरन पलोटौं बीर,
प्रेमसखी नाम जाकों पद पद्म पोगी॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (57)
वह दिन कब आएगा जब मैं श्री वृन्दावन की लताओं के मध्य ऊँचे स्वर में 'श्री राधिका! श्री राधिका!' पुकारूँगी और श्री वृंदावन धाम के उस परम-रस में मेरी गति और बुद्धि पंगु (स्तब्ध) हो जाएगी? [1]
वह दिन कब आएगा जब मैं अपनी स्वामिनी जू की सहचरी कहलाऊँगी और श्री युगल के अनन्य प्रेम के गीत गाते हुए मेरी बुद्धि पूरी तरह प्रेम में मग्न हो जाएगी? [2]
वह दिन कब आएगा जब मैं श्री धाम वृन्दावन की कुंज-गलियों में टकटकी लगाकर श्री श्यामा-श्याम की बाट जोहूँगी और उनकी अलौकिक छवि का पान कर अपने नेत्रों को शीतल करते हुए अपनी देह की सुध-बुध खो बैठूँगी? [3]
हे सखी! वह दिन कब आएगा जब मैं अपनी प्यारी जू के सुकोमल चरणों को अपने हाथों से दबाऊँगी क्योंकि प्रेमसखी की एकमात्र अभिलाषा उन्हीं के चरणकमलों की निष्काम सेवा है। [4]

