(राग-भैरवी व गुनकली)
किशोरी मेरी हरो विरह की बाधा।
करुणा सिन्धु दयाल लड़ैती, तुम सब लायक राधा॥ [1]
पतितन पावन जन अपनावन, तुमरे चरण अराधा।
तन मन की कछु छुपी न तुम सें, हो गुन रूप अगाधा॥ [2]
शरणागत प्रतिपाल स्वामिनी, प्रान जीबन सुख साधा।
“रूपमाधुरी” शरण पड़ी है, सबतज जगत उपाधा॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (115)
हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं। [1]
आप पतितों को पावन करने वाली और अपने जनों को अपनाने वाली हैं, मैंने सदैव आपके ही चरणों की आराधना की है। मेरे तन और मन की कोई भी बात आपसे छिपी नहीं है, क्योंकि आप अगाध रूप और अनंत गुणों की स्वामिनी हैं। [2]
हे शरणागतों का पालन करने वाली स्वामिनी! आप ही मेरे प्राणों का आधार और सुखों का एकमात्र साधन हैं। श्री रूपमाधुरी कहते हैं कि अब तो संसार के सभी प्रपंचों और झंझटों को त्यागकर मैं केवल आपकी ही शरण में आ पड़ी हूँ। [3]
किशोरी मेरी हरो विरह की बाधा।
करुणा सिन्धु दयाल लड़ैती, तुम सब लायक राधा॥ [1]
पतितन पावन जन अपनावन, तुमरे चरण अराधा।
तन मन की कछु छुपी न तुम सें, हो गुन रूप अगाधा॥ [2]
शरणागत प्रतिपाल स्वामिनी, प्रान जीबन सुख साधा।
“रूपमाधुरी” शरण पड़ी है, सबतज जगत उपाधा॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (115)
हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं। [1]
आप पतितों को पावन करने वाली और अपने जनों को अपनाने वाली हैं, मैंने सदैव आपके ही चरणों की आराधना की है। मेरे तन और मन की कोई भी बात आपसे छिपी नहीं है, क्योंकि आप अगाध रूप और अनंत गुणों की स्वामिनी हैं। [2]
हे शरणागतों का पालन करने वाली स्वामिनी! आप ही मेरे प्राणों का आधार और सुखों का एकमात्र साधन हैं। श्री रूपमाधुरी कहते हैं कि अब तो संसार के सभी प्रपंचों और झंझटों को त्यागकर मैं केवल आपकी ही शरण में आ पड़ी हूँ। [3]

