झूलत दोऊ ललित हिंडोरें झूमत - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (28)

झूलत दोऊ ललित हिंडोरें झूमत - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (28)

(राग मल्हार)
झूलत दोऊ ललित हिंडोरें।
झूमत गिरत परस्पर ऊपर, अंग-अंग छबि उठत हिलोरें॥ [1]
सैनन माहिं कछू बतरावत, चलत परस्पर नैनन कोरें।
ललित लड़ैती या शोभा पै, वार नोन राई तृण तोरें॥ [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (28)

श्री राधा-कृष्ण दोनों ही अत्यंत सुंदर हिंडोले पर झूल रहे हैं। झूलते समय वे परस्पर एक-दूसरे के ऊपर झुकते और गिरते हैं, जिससे उनके अंग-अंग से अद्भुत सौंदर्य की हिलोरें उठ रही हैं। [1]

वे दोनों संकेतों में ही आपस में कुछ बातें कर रहे हैं और उनके नेत्रों के सुंदर कटाक्ष परस्पर चल रहे हैं। श्री ललित लड़ैती जी इस अनुपम शोभा पर न्योछावर होकर युगल के प्रति मंगल-भावना से राई-नोन वारती हैं और तिनका तोड़ती हैं। [2]