कौन सुने अब बात हमारी - श्री सूरदास, सूरसागर

कौन सुने अब बात हमारी - श्री सूरदास, सूरसागर

कौन सुने अब बात हमारी।
समर्थ और न देखूं तुम सम, कासों व्यथा कहूं बनवारी॥ [1]
तुम अवगत अनाथ के स्वामी, दीन दयाल कुंज बिहारी।
सदा सहाय करी दासन की, जो उर धरी सोई प्रतिपारी॥ [2]
अब केह शरण जाऊँ यदुपति, राख लियो बलि त्रास निवारी।
सूरदास इन चरणनन बलि बलि, कौन गुसा तें कृपा बिसारी॥ [3]

- श्री सूरदास, सूरसागर

हे बनवारी! अब भला मेरी बात कौन सुनेगा? मुझे आपके समान कोई दूसरा सामर्थ्यवान दिखाई नहीं देता, फिर मैं अपनी अंतःकरण की पीड़ा और किससे जाकर कहूँ? [1]

हे कुंज बिहारी! आप सर्वज्ञ, अनाथों के रक्षक और दीनदयाल हैं। आपने सदा अपने दासों की सहायता की है और उनके हृदय में जो भी अभिलाषा रही, उसे आपने सदैव पूर्ण किया है। [2]

हे यदुपति! अब मैं किसकी शरण में जाऊँ, आप ही मेरे भय का निवारण कर मेरी रक्षा कीजिए। सूरदास जी कहते हैं कि मैं आपके इन चरणों पर बार-बार न्योछावर जाता हूँ, भला किस रोष के कारण आपने मुझ पर से अपनी कृपा को भुला दिया है? [3]