ओर मिले वन ना मिले, जाके रहै विचार।
ताकी पद रज ढूंढ़ के, ले ले सिर पर धार॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (16)
जिसके हृदय में निरन्तर यह विचार और उत्कण्ठा बनी रहती है कि चाहे संसार की अन्य वस्तुएँ मिलें या न मिलें, पर मुझे श्री धाम वृन्दावन वास अथवा आश्रय अवश्य ही प्राप्त हो, ऐसे व्यक्ति की चरण-रज को ढूँढ़कर, बार-बार अपने मस्तक पर धारण करना चाहिए।
ताकी पद रज ढूंढ़ के, ले ले सिर पर धार॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (16)
जिसके हृदय में निरन्तर यह विचार और उत्कण्ठा बनी रहती है कि चाहे संसार की अन्य वस्तुएँ मिलें या न मिलें, पर मुझे श्री धाम वृन्दावन वास अथवा आश्रय अवश्य ही प्राप्त हो, ऐसे व्यक्ति की चरण-रज को ढूँढ़कर, बार-बार अपने मस्तक पर धारण करना चाहिए।

