बृजमाँहि महा निज धाम बन्यो - ब्रज के सवैया

बृजमाँहि महा निज धाम बन्यो - ब्रज के सवैया

(सवैया)
बृजमाँहि महा निज धाम बन्यो।
जेंते देव, अदेव, रहे तन धारी॥ [1]
रिद्धि औ सिद्धि, समाधि सनी।
रसभूमि बनी रस की रस-वारी॥ [2]
यह लाड़िली प्यारी की लाड़ लड़ी।
वृषभानु सुता लिपटी रस प्यारी॥ [3]
सावन तीज सुहावन सी।
वर्षा वरसानों करें सुख कारी॥ [4]

- ब्रज के सवैया

ब्रजमंडल में साक्षात् परम निज धाम श्री बरसाना प्रकट हुआ है, जहाँ समस्त देवता और असुर भी इस पावन भूमि का आश्रय प्राप्त करने के लिए कामना करते हैं। [1]

यह भूमि ऋद्धि-सिद्धि और प्रेम-समाधि से समन्वित होकर साक्षात् आनंद और रस की परम वाटिका बन गई है। [2]

यहाँ की भूमि श्री लाड़िली जी (श्री राधा रानी) के दुलार में पगी हुई है और वृषभानुनंदिनी श्री राधा के प्रेम-रस से सिंचित है। [3]

सावन की तीज की भाँति श्री बरसाना धाम का वातावरण सुहावना है, जो सदा सुखदायिनी रस-वर्षा करता रहता है। [4]