लागो कृष्ण-चरन मन मेरौ [1] - रूप कुँवरि जी

लागो कृष्ण-चरन मन मेरौ [1] - रूप कुँवरि जी

(राग पीलू ताल तिताला)
लागो कृष्ण-चरन मन मेरौ॥ [1]
ध्रुव प्रह्लाद दास कर लीन्हें, ऐसहि मौपर हेरौ।
गजकी टेर सुनत ही तुमने, तुरतहि जाइ उबेरौ॥ [2]
भवसागर से पार उतारहु, नेक करौ नहिं देरौ।
रूपकुँवरि रानीको दीजे, प्रभु पद-प्रेम घनेरौ॥ [3]

- रूप कुँवरि जी

मेरा मन श्री कृष्ण के चरणों में अनुरक्त हो गया है। [1]

जिस प्रकार आपने ध्रुव और प्रह्लाद को अपना दास बनाकर उन पर अनुग्रह किया, वैसे ही कृपालु दृष्टि मुझ पर भी कीजिए, और जैसे गजराज की पुकार सुनते ही आपने शीघ्रता से जाकर उसका उद्धार किया था, वैसे ही मुझे भी संकट से उबारिए। [2]

अब आप तनिक भी विलंब न करते हुए मुझे इस संसार-रूपी सागर से पार उतार दीजिए और अपनी दासी रूपकुँवरि को अपने चरणों का अत्यंत सघन एवं अनन्य प्रेम प्रदान कीजिए। [3]