जासौं सपरस चाहिए तासौ अपरस - भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ, उत्तरार्ध (21)

जासौं सपरस चाहिए तासौ अपरस - भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ, उत्तरार्ध (21)

(कुण्डलियाँ)
जासौं सपरस चाहिए, तासौं अपरस नित्त।
जासौं अपरस चाहिए, तासौं चिभुकौ चित्त॥ [1]
तासौं चिभुको चित्त, भई विपरीत बुद्धि अब।
असन बसन आचार, कनक कामिनि राँचे सब॥ [2]
भगवत रसिक अनन्य, करै अस्पर्धा तासौं।
पतित होय गिरि परै, परम पद हू ते जासौं॥ [3]

- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ, उत्तरार्ध (21)

जिन रसिकों एवं महापुरुषों का हमें नित्य संग करना चाहिए, उनसे तो लोग प्राय: सदा दूर रहते हैं और जिन सांसारिक वासनाओं से युक्त लोगों से दूर रहना चाहिए, उनसे चुंबक की तरह मन चिपका रहता है। [1]

ऐसी आसक्ति के कारण लोगों की बुद्धि ऐसी भ्रष्ट हो रही है कि ये सब श्रीहरि और श्रीगुरु से विमुख होकर भोजन, वस्त्र, बाह्य-आचार तथा कंचन-कामिनी में ही जीवन भर आसक्त रहते हैं। [2]

भगवतरसिक जी कहते हैं कि अनन्य रसिक जन ऐसे बुद्धिहीन लोगों के इन आचरणों से कोई स्पर्धा नहीं करते हैं, क्योंकि उन्हें यह चाल-चलन बिल्कुल नहीं सुहाता। वे इस रहस्य को अच्छी तरह जानते हैं कि इस प्रकार के सांसारिक व्यक्तियों का संग एवं विपरीत आचरण करने से परम पद पर पहुँचने वाला व्यक्ति भी अंततः पतित होकर पुनः उस परम पद से वंचित हो जाता है। [3]