जदपि अपराध सतत बहु कीन्हो।
तदपि कृपासिन्धु वृन्दावन, वास शरण में दीन्हो॥ [1]
कोटि मातृ ममता तेरे हिय, दोष नाहिं उर लीन्हो।
दया विवश अति अधम दीन लखि, दया दीन पर कीन्हो॥ [2]
हौं मूरख नहिं ग्लानि हृदय तेरी, करुणा को नहिं चीन्हो।
'राधाचरणदास' दूषित मति, सदा अनादर कीन्हो॥ [3]
- श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
यद्यपि मैंने निरंतर अनेक अपराध किए हैं, फिर भी हे कृपा के सागर श्री वृंदावन धाम! आपने मुझे अपनी शरण में लेकर यहाँ वास प्रदान किया है। [1]
आपके हृदय में करोड़ों माताओं के समान ममता है, जिससे आपने मेरे दोषों को कभी अपने मन में स्थान नहीं दिया। मुझे अत्यंत पतित और असहाय देखकर आपने दया से विवश होकर मुझ दीन पर अपनी महती कृपा की है। [2]
मैं ऐसा मूर्ख हूँ जिसके हृदय में अपने कुकर्मों के प्रति कोई ग्लानि नहीं है और न ही मैंने आपकी इस अनुपम करुणा को कभी पहचाना है। श्री राधाचरणदास कहते हैं कि मेरी बुद्धि इतनी कलुषित है कि मैंने सदा आपकी इस दयालुता का अनादर ही किया है। [3]
तदपि कृपासिन्धु वृन्दावन, वास शरण में दीन्हो॥ [1]
कोटि मातृ ममता तेरे हिय, दोष नाहिं उर लीन्हो।
दया विवश अति अधम दीन लखि, दया दीन पर कीन्हो॥ [2]
हौं मूरख नहिं ग्लानि हृदय तेरी, करुणा को नहिं चीन्हो।
'राधाचरणदास' दूषित मति, सदा अनादर कीन्हो॥ [3]
- श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
यद्यपि मैंने निरंतर अनेक अपराध किए हैं, फिर भी हे कृपा के सागर श्री वृंदावन धाम! आपने मुझे अपनी शरण में लेकर यहाँ वास प्रदान किया है। [1]
आपके हृदय में करोड़ों माताओं के समान ममता है, जिससे आपने मेरे दोषों को कभी अपने मन में स्थान नहीं दिया। मुझे अत्यंत पतित और असहाय देखकर आपने दया से विवश होकर मुझ दीन पर अपनी महती कृपा की है। [2]
मैं ऐसा मूर्ख हूँ जिसके हृदय में अपने कुकर्मों के प्रति कोई ग्लानि नहीं है और न ही मैंने आपकी इस अनुपम करुणा को कभी पहचाना है। श्री राधाचरणदास कहते हैं कि मेरी बुद्धि इतनी कलुषित है कि मैंने सदा आपकी इस दयालुता का अनादर ही किया है। [3]

