(राग विहाग)
पौंढे प्रेम के पर्जंग।
सुरत-रस में मगन दोऊ, लेत भरि-भरि अंक॥ [1]
कोक-कला प्रवीन बिहरत, उठत भावतरंग।
'कृष्णदास' गिरिधर बस कीन्हें, जीति कोटि अनंग॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (801)
श्री प्रिया-प्रियतम प्रेम की शय्या पर विराजमान हैं और वे दोनों दिव्य सुरत-रस में मग्न होकर एक-दूसरे को बार-बार हृदय से लगाकर आलिंगनबद्ध कर रहे हैं। [1]
रति-कला में अत्यंत निपुण युगल इस प्रकार विहार कर रहे हैं कि उनके हृदय में प्रेम की दिव्य भाव-तरंगें उठ रही हैं। श्री कृष्णदास जी कहते हैं कि इस क्रीड़ा में श्री राधा ने करोड़ों कामदेवों को जीतने वाले गिरिधारी श्री कृष्ण को अपने वश में कर लिया है। [2]
पौंढे प्रेम के पर्जंग।
सुरत-रस में मगन दोऊ, लेत भरि-भरि अंक॥ [1]
कोक-कला प्रवीन बिहरत, उठत भावतरंग।
'कृष्णदास' गिरिधर बस कीन्हें, जीति कोटि अनंग॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (801)
श्री प्रिया-प्रियतम प्रेम की शय्या पर विराजमान हैं और वे दोनों दिव्य सुरत-रस में मग्न होकर एक-दूसरे को बार-बार हृदय से लगाकर आलिंगनबद्ध कर रहे हैं। [1]
रति-कला में अत्यंत निपुण युगल इस प्रकार विहार कर रहे हैं कि उनके हृदय में प्रेम की दिव्य भाव-तरंगें उठ रही हैं। श्री कृष्णदास जी कहते हैं कि इस क्रीड़ा में श्री राधा ने करोड़ों कामदेवों को जीतने वाले गिरिधारी श्री कृष्ण को अपने वश में कर लिया है। [2]

