अरपी श्री हरि चरन, जुग पुहुप पराग निहार।
बिचरहिं या मैं रसिकबर, मधुकर निकर अपार॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (52)
श्री रसखान कहते हैं कि मैंने यह प्रेम-वाटिका श्री कृष्ण के युगल चरण रूपी दिव्य पुष्प के पराग की अनुपम शोभा को निहारकर उन्हीं के चरणों में समर्पित की है। मेरी ऐसी आशा है कि अपार भौंरों के समूह रूपी रसिक जन इसमें विचरण करेंगे अर्थात इससे रस ग्रहण कर आनंदित होंगे।
बिचरहिं या मैं रसिकबर, मधुकर निकर अपार॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (52)
श्री रसखान कहते हैं कि मैंने यह प्रेम-वाटिका श्री कृष्ण के युगल चरण रूपी दिव्य पुष्प के पराग की अनुपम शोभा को निहारकर उन्हीं के चरणों में समर्पित की है। मेरी ऐसी आशा है कि अपार भौंरों के समूह रूपी रसिक जन इसमें विचरण करेंगे अर्थात इससे रस ग्रहण कर आनंदित होंगे।

