डारि गयो मनमोहन पासी।
आँबा की डालि कोयल इक बोलै,
मेरो मरण अरु जग केरी हाँसी॥ [1]
बिरहकी मारी मैं बन-बन डोलूँ,
प्राण तजूँ करवत ल्यूँ कासी।
मीराके प्रभु हरि अबिनासी,
तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी॥ [2]
- श्री मीराबाई
मनमोहन श्रीकृष्ण मुझ पर अपने प्रेम का पाश डाल गए हैं। आम की डाल पर कोयल का बोलना मेरे लिए मरणतुल्य कष्टदायी है और जग के लिए परिहास का कारण बन गया है।[1]
मैं इस विरह की मारी वन-वन भटक रही हूँ और इस दुःख से मुक्ति के लिए काशी जाकर करवट लेकर अपने प्राण त्यागने को तत्पर हूँ। मीराबाई कहती हैं कि हे अविनाशी प्रभु हरि! आप ही मेरे स्वामी हैं और मैं आपकी दासी हूँ। [2]
आँबा की डालि कोयल इक बोलै,
मेरो मरण अरु जग केरी हाँसी॥ [1]
बिरहकी मारी मैं बन-बन डोलूँ,
प्राण तजूँ करवत ल्यूँ कासी।
मीराके प्रभु हरि अबिनासी,
तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी॥ [2]
- श्री मीराबाई
मनमोहन श्रीकृष्ण मुझ पर अपने प्रेम का पाश डाल गए हैं। आम की डाल पर कोयल का बोलना मेरे लिए मरणतुल्य कष्टदायी है और जग के लिए परिहास का कारण बन गया है।[1]
मैं इस विरह की मारी वन-वन भटक रही हूँ और इस दुःख से मुक्ति के लिए काशी जाकर करवट लेकर अपने प्राण त्यागने को तत्पर हूँ। मीराबाई कहती हैं कि हे अविनाशी प्रभु हरि! आप ही मेरे स्वामी हैं और मैं आपकी दासी हूँ। [2]

