मो मन अटक्यौ श्याम सों, गढ़यौ रूप में जाय।
चहले परि निकसै नहीं, मनौं दूबरी गाय॥
- ब्रज के दोहे
मेरा मन श्रीश्यामसुन्दर के अनुपम सौन्दर्य में ऐसा अटककर गड़ गया है कि अब वहाँ से निकल ही नहीं सकता। उसकी दशा उस दुबली-पतली गाय के समान हो गई है, जो कहीं फँस जाने पर छटपटाकर भी बाहर नहीं निकल पाती।
चहले परि निकसै नहीं, मनौं दूबरी गाय॥
- ब्रज के दोहे
मेरा मन श्रीश्यामसुन्दर के अनुपम सौन्दर्य में ऐसा अटककर गड़ गया है कि अब वहाँ से निकल ही नहीं सकता। उसकी दशा उस दुबली-पतली गाय के समान हो गई है, जो कहीं फँस जाने पर छटपटाकर भी बाहर नहीं निकल पाती।

