लेत परस्पर अंग सुवास मन - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (19)

लेत परस्पर अंग सुवास मन - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (19)

लेत परस्पर अंग सुवास।
मन तरंग उठत मनमथ को और न कछू प्रकास॥ [1]
रोम रोम तन यह सुख बिलसत भोजन भूख न प्यास।
श्रीरसिकबिहारी मगन रहत नित सहत न खटक उसास॥ [2]

- श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (19)

श्रीप्रिया-प्रियतम परस्पर एक-दूसरे के अंगों की दिव्य सुगंध का रसास्वादन कर रहे हैं, जिससे उनके मन में अलौकिक प्रेम की तरंगें उठ रही हैं और इस दिव्य रस के अतिरिक्त उन्हें अन्य किसी भी बाहरी वस्तु का भान नहीं है। [1]

उनके शरीर का रोम-रोम इस परम सुख का अनुभव कर रहा है, जिसके सामने भोजन, भूख और प्यास की सारी सुध-बुध खो गई है। श्रीरसिक देव जी कहते हैं कि बिहारी-बिहारिन एवं अनन्य रसिक इस नित्य विहार में ऐसे मग्न रहते हैं कि इसमें एक उसाँस की खटक या क्षणिक व्यवधान भी सहन नहीं करते। [2]