जगाद राधा प्रियसंगमेऽपि न मे - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.34)

जगाद राधा प्रियसंगमेऽपि न मे - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.34)

जगाद राधा प्रियसंगमेऽपि न मे सुखं भोः सखि किंचिदत्र।
मनस्यहो वेणुरवान्विताय कलिन्दजाकूलवनाय वाञ्छा॥

- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.34)

कुरुक्षेत्र में श्रीराधा अपनी एक सखी से कहती हैं कि हे सखी! प्रियतम (श्री कृष्ण) के इस मिलन में भी मुझे यहाँ तनिक भी सुख प्राप्त नहीं हो रहा है। आश्चर्य है कि मेरे मन में तो केवल वेणु की मधुर ध्वनि से गुंजायमान श्री धाम वृन्दावन के यमुना तट में ही जाने की ही तीव्र लालसा हो रही है।