वन्दौं श्रीराधा-हरिकौ अनुराग।
तन मन एक अनेक रंग भरे, मनहुँ रागिनी राग॥ [1]
अंग अंग लपटानें मानहुँ, प्रेम रंग कौ पाग।
रूप अनूप सकल गुन सीमा, कहत न बनैं सुहाग॥ [2]
विहरत कुंज कुटीर धीर, सेवत वृंदावन बाग।
निसि दिन छिन न चरन छाँड़त, अब व्यासदासि कौ भाग॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (03)
मैं श्रीराधा और श्रीहरि के दिव्य प्रेम की वंदना करता हूँ। उन दोनों के तन और मन मिलकर एक हो गए हैं जो अनेक लीला-रसों के रंगों से भरे हैं, मानो जैसे राग और रागिनी परस्पर मिलकर एक हो गए हों। [1]
वे एक-दूसरे के अंग-अंग से इस प्रकार लिपटे हुए हैं मानो साक्षात् प्रेम के रंग में पगे हुए हों। उनका रूप अनुपम है और वे समस्त दिव्य गुणों की चरम सीमा हैं, उनके इस अखंड सौभाग्य और परस्पर सुहाग का वर्णन करते नहीं बनता। [2]
वे वृंदावन के सुंदर कुंज-कुटीरों में अत्यंत धीर-गंभीर भाव से विहरण करते हैं। अब श्री हरिराम व्यास जी का ऐसा परम सौभाग्य जागा है कि वह रात-दिन एक क्षण के लिए भी उनके युगल चरणों को नहीं छोड़ते। [3]
तन मन एक अनेक रंग भरे, मनहुँ रागिनी राग॥ [1]
अंग अंग लपटानें मानहुँ, प्रेम रंग कौ पाग।
रूप अनूप सकल गुन सीमा, कहत न बनैं सुहाग॥ [2]
विहरत कुंज कुटीर धीर, सेवत वृंदावन बाग।
निसि दिन छिन न चरन छाँड़त, अब व्यासदासि कौ भाग॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (03)
मैं श्रीराधा और श्रीहरि के दिव्य प्रेम की वंदना करता हूँ। उन दोनों के तन और मन मिलकर एक हो गए हैं जो अनेक लीला-रसों के रंगों से भरे हैं, मानो जैसे राग और रागिनी परस्पर मिलकर एक हो गए हों। [1]
वे एक-दूसरे के अंग-अंग से इस प्रकार लिपटे हुए हैं मानो साक्षात् प्रेम के रंग में पगे हुए हों। उनका रूप अनुपम है और वे समस्त दिव्य गुणों की चरम सीमा हैं, उनके इस अखंड सौभाग्य और परस्पर सुहाग का वर्णन करते नहीं बनता। [2]
वे वृंदावन के सुंदर कुंज-कुटीरों में अत्यंत धीर-गंभीर भाव से विहरण करते हैं। अब श्री हरिराम व्यास जी का ऐसा परम सौभाग्य जागा है कि वह रात-दिन एक क्षण के लिए भी उनके युगल चरणों को नहीं छोड़ते। [3]

