पुनि बैठी कुंज-महल मैं संग - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (65)

पुनि बैठी कुंज-महल मैं संग - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (65)

पुनि बैठी कुंज-महल मैं संग लीनैं श्याम।
गरबाहीं कियैं तकिया पर लेटत, उरजन, सौं मनहु लसावत काम॥ [1]
बिम्ब अधर पर बेसरि लटकी, चाखत भाखत लाल सौं अरे यह नाम॥
(जैश्री) वंशीअलि ललिता जू धनि, धनि जीवन, धनि यह बाम॥ [2]

- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (65)

श्री प्रिया जी पुन: कुंज-महल में श्री श्यामसुंदर के संग विराजमान हैं। वे दोनों परस्पर गले में बाँहें डालकर तकिये के सहारे लेटे हुए हैं, जहाँ उनके अंगों के स्पर्श और आलिंगन को देखकर साक्षात् कामदेव भी लज्जित हो रहा है। [1]

श्रीराधा के बिम्बफल के समान लाल अधरों पर नासिका की बेसरि लटक रही है, जिसे रसपूर्वक चखते हुए लालजी (श्रीकृष्ण) उनसे बातें कर रहे हैं और प्रेम से उनका नाम पुकार रहे हैं। इस नित्य-लीला को निरखकर वंशीअलि जी बलिहार होकर कहते कि ललिता जी धन्य हैं, उनका जीवन धन यह नित्य विहार धन्य है और ये परम प्यारी श्रीराधा महारानी जू धन्य हैं। [2]