स्याम रंग अरु नैन सलौने, अलक रही बलखाई। [1]
मोर मुकुट सिर अधिक बिराजे, मुरली मधुर बजाई॥ [2]
मुक्ताहल नासा बिच राजे, लाल अधर पर वारी। [3]
'दासीदया' दरस की प्यासी, किरपा करो बिहारी॥ [4]
- श्री दयाबाई
श्री श्यामसुंदर का सलोना श्यामल वर्ण, मनभावन नयन और घुंघराली अलकें अत्यंत शोभायमान हैं।
उनके मस्तक पर मोरमुकुट अत्यधिक सुशोभित हो रहा है और वे अपने अधरों पर बांसुरी रखकर मधुर तान बजा रहे हैं। [2]
उनकी नासिका में उज्ज्वल मोती (मुक्ताहल) सुशोभित है तथा मैं उनके रसमयी लाल अधरों पर बलिहारी जाती हूँ। [3]
दासी दयाबाई कहती हैं कि हे बाँकेबिहारी! मैं आपके दिव्य दर्शनों की प्यासी हूँ, मुझ पर अपनी कृपादृष्टि कीजिए और मुझे दर्शन दीजिए। [4]
मोर मुकुट सिर अधिक बिराजे, मुरली मधुर बजाई॥ [2]
मुक्ताहल नासा बिच राजे, लाल अधर पर वारी। [3]
'दासीदया' दरस की प्यासी, किरपा करो बिहारी॥ [4]
- श्री दयाबाई
श्री श्यामसुंदर का सलोना श्यामल वर्ण, मनभावन नयन और घुंघराली अलकें अत्यंत शोभायमान हैं।
उनके मस्तक पर मोरमुकुट अत्यधिक सुशोभित हो रहा है और वे अपने अधरों पर बांसुरी रखकर मधुर तान बजा रहे हैं। [2]
उनकी नासिका में उज्ज्वल मोती (मुक्ताहल) सुशोभित है तथा मैं उनके रसमयी लाल अधरों पर बलिहारी जाती हूँ। [3]
दासी दयाबाई कहती हैं कि हे बाँकेबिहारी! मैं आपके दिव्य दर्शनों की प्यासी हूँ, मुझ पर अपनी कृपादृष्टि कीजिए और मुझे दर्शन दीजिए। [4]

