(राग विभास)
कबैं हरि कृपा करिहौ सुरति मेरी। और न कोऊ काटन कों मोह-बेरी॥ [1]
काम-लोभ आदि ये निर्दय अहेरी। मिलिकै मन-मति मृगी चहुँधा घेरी॥ [2]
रोपी आय पास पासि दुरासा केरी। देत वाही में फिरि-फिरि फेरी॥ [3]
परी कुपथ कंटक आपदा घनेरी। नैक ही न पावति भजि भजन सेरी॥ [4]
दंभ के आरंभ ही सतसंगति डेरी। करैं क्यों ‘गदाधर’ बिन करुना तेरी॥ [5]
- श्री गदाधर भट्ट जी, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (2)
हे श्रीहरि! आप कब कृपा करके मेरी सुधि लेंगे? आपके अतिरिक्त इस संसार में मेरी इस सुदृढ़ मोह-रूपी बेड़ी को काटने वाला और कोई दूसरा नहीं है। [1]
काम और लोभ आदि ये अत्यंत निर्दयी शिकारी हैं, जिन्होंने आपस में मिलकर मेरे मन और बुद्धि रूपी हिरनी को चारों ओर से घेर लिया है। [2]
इन शिकारियों ने आकर मेरे समीप ही दुराशा (झूठी आशाओं) का फंदा लगा दिया है और वे मेरे मन को बार-बार उसी जाल में धकेल कर चक्कर खिला रहे हैं। [3]
कुमार्ग पर चलने के कारण यह मन रूपी हिरनी कांटों से भरी अनगिनत विपत्तियों में फँस गई है, जिससे व्याकुल होकर वह आपके भजन रूपी शीतल शरण की ओर भागने का तनिक भी मार्ग नहीं पा रही है। [4]
बाहरी दंभ और पाखंड के प्रसार के कारण सत्संगति का वास बहुत दूर हो गया है। गदाधर जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपकी अहैतुकी कृपा के बिना भला मेरा उद्धार कैसे हो सकता है? [5]
कबैं हरि कृपा करिहौ सुरति मेरी। और न कोऊ काटन कों मोह-बेरी॥ [1]
काम-लोभ आदि ये निर्दय अहेरी। मिलिकै मन-मति मृगी चहुँधा घेरी॥ [2]
रोपी आय पास पासि दुरासा केरी। देत वाही में फिरि-फिरि फेरी॥ [3]
परी कुपथ कंटक आपदा घनेरी। नैक ही न पावति भजि भजन सेरी॥ [4]
दंभ के आरंभ ही सतसंगति डेरी। करैं क्यों ‘गदाधर’ बिन करुना तेरी॥ [5]
- श्री गदाधर भट्ट जी, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (2)
हे श्रीहरि! आप कब कृपा करके मेरी सुधि लेंगे? आपके अतिरिक्त इस संसार में मेरी इस सुदृढ़ मोह-रूपी बेड़ी को काटने वाला और कोई दूसरा नहीं है। [1]
काम और लोभ आदि ये अत्यंत निर्दयी शिकारी हैं, जिन्होंने आपस में मिलकर मेरे मन और बुद्धि रूपी हिरनी को चारों ओर से घेर लिया है। [2]
इन शिकारियों ने आकर मेरे समीप ही दुराशा (झूठी आशाओं) का फंदा लगा दिया है और वे मेरे मन को बार-बार उसी जाल में धकेल कर चक्कर खिला रहे हैं। [3]
कुमार्ग पर चलने के कारण यह मन रूपी हिरनी कांटों से भरी अनगिनत विपत्तियों में फँस गई है, जिससे व्याकुल होकर वह आपके भजन रूपी शीतल शरण की ओर भागने का तनिक भी मार्ग नहीं पा रही है। [4]
बाहरी दंभ और पाखंड के प्रसार के कारण सत्संगति का वास बहुत दूर हो गया है। गदाधर जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपकी अहैतुकी कृपा के बिना भला मेरा उद्धार कैसे हो सकता है? [5]

