पतित्वो धरणीपृष्ठे गृहीत्वा दशनैस्तृणम्।
तवैव चरणेदास्यं याचे वृन्दावनेश्वरी॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (12)
हे वृन्दावनेश्वरी (श्री राधा)! मैं पृथ्वी पर साष्टांग दंडवत लोटकर और अपने दाँतों में तिनका दबाकर अत्यंत दीन भाव से केवल आपके ही श्रीचरणों की अनन्य दासता की याचना करता हूँ।
तवैव चरणेदास्यं याचे वृन्दावनेश्वरी॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (12)
हे वृन्दावनेश्वरी (श्री राधा)! मैं पृथ्वी पर साष्टांग दंडवत लोटकर और अपने दाँतों में तिनका दबाकर अत्यंत दीन भाव से केवल आपके ही श्रीचरणों की अनन्य दासता की याचना करता हूँ।

