(राग कान्हड़ा)
आज बंशीवट वरषत रंग।
यमुना तीर समीर सुहावन, बोलत विविध विहंग॥ [1]
कीरतिकुँवरि लाल नन्दजी को, झूलि रहे इक संग।
रूपसिन्धु के अंग अंग ते, छबि की उठत तरंग॥ [2]
बजत बीन ताउस सरंगी, बंशी झाँझ मृदंग।
नारायण गावतिं मिलि सजनी, हिय में बढ़त उमंग॥ [3]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (20)
आज बंशीवट पर प्रेम-रस की वर्षा हो रही है। यमुना जी के तट पर अत्यंत सुखद और शीतल मंद समीर बह रही है तथा विभिन्न प्रकार के पक्षी मधुर कलरव कर रहे हैं। [1]
कीर्ति-किशोरी श्री राधा जी और नंदलाल श्री कृष्ण एक साथ हिंडोले में झूल रहे हैं। सौंदर्य के महासागर इन दोनों प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से अनुपम शोभा की तरंगें उठ रही हैं। [2]
वहाँ वीणा, ताऊस, सारंगी, बाँसुरी, झाँझ और मृदंग आदि वाद्य यंत्र बज रहे हैं। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि सभी सखियाँ मिलकर मधुर गान कर रही हैं, जिससे हृदय में आनंद की उमंग लगातार बढ़ती जा रही है। [3]
आज बंशीवट वरषत रंग।
यमुना तीर समीर सुहावन, बोलत विविध विहंग॥ [1]
कीरतिकुँवरि लाल नन्दजी को, झूलि रहे इक संग।
रूपसिन्धु के अंग अंग ते, छबि की उठत तरंग॥ [2]
बजत बीन ताउस सरंगी, बंशी झाँझ मृदंग।
नारायण गावतिं मिलि सजनी, हिय में बढ़त उमंग॥ [3]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (20)
आज बंशीवट पर प्रेम-रस की वर्षा हो रही है। यमुना जी के तट पर अत्यंत सुखद और शीतल मंद समीर बह रही है तथा विभिन्न प्रकार के पक्षी मधुर कलरव कर रहे हैं। [1]
कीर्ति-किशोरी श्री राधा जी और नंदलाल श्री कृष्ण एक साथ हिंडोले में झूल रहे हैं। सौंदर्य के महासागर इन दोनों प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से अनुपम शोभा की तरंगें उठ रही हैं। [2]
वहाँ वीणा, ताऊस, सारंगी, बाँसुरी, झाँझ और मृदंग आदि वाद्य यंत्र बज रहे हैं। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि सभी सखियाँ मिलकर मधुर गान कर रही हैं, जिससे हृदय में आनंद की उमंग लगातार बढ़ती जा रही है। [3]

