अन्यथा त्वनवस्था स्या - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (08)

अन्यथा त्वनवस्था स्या - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (08)

अन्यथा त्वनवस्था स्या त्स्वातन्त्र्य पारतंत्र के।
अन्यथापि तदेव स्यादतस्त्वत्रैव संस्थितिः॥

- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (08)

यदि ऐसा न माना जाए कि समस्त शक्तियाँ श्री राधा के अधीन हैं, और श्री राधा को भी किसी अन्य के अधीन माना जाए, तो अनवस्था-दोष उत्पन्न होगा। अतः श्री राधा के भक्त को यही मानना चाहिए कि समस्त शक्तियाँ श्री राधिका के आश्रित एवं अधीन हैं और वे स्वयं पूर्णतः स्वाधीन हैं।