(राग खम्माच)
हों सबभांति विगारी प्यारी तुम निज विरद सँभारो।
सोयसोय खोये जन्मांतर करुणादृष्टि निहारो॥ [1]
अवहूँ होंहुँ मधुप पदपंकज ऐसी मनै विचारो।
ललितकिशोरी छवि मकरंदै मो अँखियन मुख ठारो॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (121)
हे श्री प्यारी जी (राधा रानी)! मैं तो सब प्रकार से बिगड़ा हुआ/अपराधी हूँ, परंतु आप अपने कृपालु स्वभाव और पतितों का उद्धार करने के अपने विरद (स्वभाव) को संभालिए। मैंने अपने अनेक जन्म अज्ञानता की नींद में सोकर ही गँवा दिए हैं, इसलिए अब आप मुझ पर अपनी कृपादृष्टि डालिए। [1]
हे किशोरीजो! ऐसी कृपा-विचार कीजिए कि मैं अभी भी आपके चरण-कमलों का भ्रमर बन जाऊँ। श्री ललितकिशोरी जी कहते हैं कि अपनी अलौकिक छवि के मकरंद-रस को मेरे नेत्रों और मुख में ढालकर मुझे तृप्त कर दीजिए। [2]
हों सबभांति विगारी प्यारी तुम निज विरद सँभारो।
सोयसोय खोये जन्मांतर करुणादृष्टि निहारो॥ [1]
अवहूँ होंहुँ मधुप पदपंकज ऐसी मनै विचारो।
ललितकिशोरी छवि मकरंदै मो अँखियन मुख ठारो॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (121)
हे श्री प्यारी जी (राधा रानी)! मैं तो सब प्रकार से बिगड़ा हुआ/अपराधी हूँ, परंतु आप अपने कृपालु स्वभाव और पतितों का उद्धार करने के अपने विरद (स्वभाव) को संभालिए। मैंने अपने अनेक जन्म अज्ञानता की नींद में सोकर ही गँवा दिए हैं, इसलिए अब आप मुझ पर अपनी कृपादृष्टि डालिए। [1]
हे किशोरीजो! ऐसी कृपा-विचार कीजिए कि मैं अभी भी आपके चरण-कमलों का भ्रमर बन जाऊँ। श्री ललितकिशोरी जी कहते हैं कि अपनी अलौकिक छवि के मकरंद-रस को मेरे नेत्रों और मुख में ढालकर मुझे तृप्त कर दीजिए। [2]

