खग मृग द्रुम सेवत सदा, धरे सरस निज रूप।
वंशीवट राजत मनहुँ, सकल विपिन को भूप॥
- श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (284)
पक्षी, मृग और वृक्ष अपने अति सरस व अलौकिक रूप को धारण करके जिनकी निरंतर सेवा करते हैं, वह परम पावन वंशीवट मानो सम्पूर्ण वृन्दावन धाम का सम्राट् होकर शोभायमान हो रहा है।
वंशीवट राजत मनहुँ, सकल विपिन को भूप॥
- श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (284)
पक्षी, मृग और वृक्ष अपने अति सरस व अलौकिक रूप को धारण करके जिनकी निरंतर सेवा करते हैं, वह परम पावन वंशीवट मानो सम्पूर्ण वृन्दावन धाम का सम्राट् होकर शोभायमान हो रहा है।

