घर आवे वैष्णव जबहीं, दीजे चार रतन।
आसन, जल, वाणी मधुर, यथाशक्ति सो अन्न॥
- गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (49)
जब भी कोई भक्त घर पधारें, तो उन्हें चार अमूल्य रत्न अर्पण करने चाहिए—सम्मानजनक आसन, शीतल जल, अत्यंत मधुर वाणी और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न।
आसन, जल, वाणी मधुर, यथाशक्ति सो अन्न॥
- गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (49)
जब भी कोई भक्त घर पधारें, तो उन्हें चार अमूल्य रत्न अर्पण करने चाहिए—सम्मानजनक आसन, शीतल जल, अत्यंत मधुर वाणी और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न।

