पौंढी पिय-सँग वृषभानु-कुमारी - श्री छीत स्वामी जी की वाणी (157)

पौंढी पिय-सँग वृषभानु-कुमारी - श्री छीत स्वामी जी की वाणी (157)

(राग बिहागरो)
पौंढी पिय-सँग वृषभानु-कुमारी।
निरखि वदन छबि नंद-नंदन के, लागि कंठ सों प्रान-पियारी॥ [1]
चरन चरन धरि भुजनि जोटिके, अधर-पान मधू करत सुधा री।
‘छीत-स्वामी’ नबललाल गिरिधर पिय, कुंजन-पुंज केलि हितकारी॥ [2]

- श्री छीत स्वामी, श्री छीत स्वामी जी की वाणी (157)

श्रीवृषभानुकिशोरी श्रीराधा अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ शयन कर रही हैं और अपने प्राणप्रिय नन्दनन्दन के मुखमण्डल की अनुपम छवि को निहारते हुए उनके कण्ठ से लग गई हैं। [1]

वे दोनों परस्पर चरणों पर चरण रखकर और अपनी भुजाओं से आलिंगनबद्ध, एक-दूसरे के अधर-अमृत रूपी मधु का पान कर रहे हैं। श्री छीतस्वामी कहते हैं कि नवकुंजों में नित्य-केलि करने वाले हितकारी नवललाल श्री गिरधरलाल ऐसे रसमय विलास में सदा निमग्न रहते हैं। [2]