राधे आधे नयनसों, तिरछी चितवन चाय।
ज्यों निशान आगे चले, पाछेको फहराय॥
- ब्रज के दोहे
जब श्री राधे जू अपने आधे खुले नेत्रों से तिरछी चितवन के कटाक्ष चलाती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई ध्वजा आगे बढ़ रही हो, किंतु उसका अंचल पीछे की ओर फहरा रहा हो।
ज्यों निशान आगे चले, पाछेको फहराय॥
- ब्रज के दोहे
जब श्री राधे जू अपने आधे खुले नेत्रों से तिरछी चितवन के कटाक्ष चलाती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई ध्वजा आगे बढ़ रही हो, किंतु उसका अंचल पीछे की ओर फहरा रहा हो।

